जब शरद आए

13 अक्तूबर 2019   |  मीना शर्मा   (4746 बार पढ़ा जा चुका है)


ताल-तलैया खिलें कमल-कमलिनी

मुदित मन किलोल करें हंस-हंसिनी!

कुसुम-कुसुम मधुलोभी मधुकर मँडराए,

सुमनों से सजे सृष्टि,जब शरद आए!!!


गेंदा-गुलाब फूलें, चंपा-चमेली,

मस्त पवन वृक्षों संग,करती अठखेली!

वनदेवी रूप नए, क्षण-क्षण दिखलाए,

सुमनों से सजे सृष्टि,जब शरद आए!!!



परदेसी पाखी आए, पाहुन बनकर,

वन-तड़ाग,बाग-बाग, पंछियों के घर!

मुखरित, गुंजित, मोहित,वृक्ष औ' लताएँ,

सुमनों से सजे सृष्टि, जब शरद आए!!!


लौट गईं नीड़ों को, बक-पंक्ति शुभ्र,

छिटकी नभ में, धवल चाँदनी निरभ्र!

रजनी के वसन जड़ीं हीरक कणिकाएँ,

सुमनों से सजे सृष्टि, जब शरद आए!!!


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रेणु
18 अक्तूबर 2019

परदेसी पाखी आए, पाहुन बनकर,
वन-तड़ाग,बाग-बाग, पंछियों के घर!
मुखरित, गुंजित, मोहित,वृक्ष औ' लताएँ,
सुमनों से सजे सृष्टि, जब शरद आए!!!
प्रिय मीना बहन , अच्छे से शरद आई नहीं पर आपकी रचना में शरद ऋतू के दर्शन हो गये | छायावादी कवियों की याद दिलाती सुंदर रचना के लिए हार्दिक शुभकामनायें और आभार |

Shashi Gupta
16 अक्तूबर 2019

बहुत सुंदर रचना मीना दी

कामिनी सिन्हा
14 अक्तूबर 2019

पूर्णिमा का चाँद तो आपकी रचना में दिखने लगा ,बिलकुल वैसी ही शीतलता प्रदान करती रचना ,सादर नमन मीना जी

आलोक सिन्हा
14 अक्तूबर 2019

बहुत अच्छी पंक्तियाँ हैं विषय का निर्वहन करते हुए |

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