मन रे !अपना कहाँ ठिकाना है!!!

14 अक्तूबर 2019   |  मीना शर्मा   (4281 बार पढ़ा जा चुका है)


मन रे,अपना कहाँ ठिकाना है?

ना संसारी, ना बैरागी, जल सम बहते जाना है,

बादल जैसे संग पवन के,यहाँ वहाँ उड़ जाना है !

जोगी जैसे अलख जगाते, नई राह मुड़ जाना है !

नहीं घरौंदा, ना ही डेरा, धूनी नहीं रमाना है !

मन रे,अपना कहाँ ठिकाना है?


मोहित होकर रह निर्मोही, निद्रित होकर भी जागृत!

चुन असार से सार मना रे, विष को पीकर बन अमृत !

काहे सोचे, कौन हमारा,कच्चा ताना बाना है!

टूटा तार, बिखर गई वीणा,फिर भी तुझको गाना है!!!

मन रे,अपना कहाँ ठिकाना है?


सपनों की इस नगरी में, कब तक भटकेगा दर दर ?

स्वप्न को सत्य समझकर रह जाएगा यहीं उलझकर!

निकल जाल से, क्रूर काल से तुझको आँख मिलाना है!

नाटक खत्म हुआ तो भ्रम का परदा भी गिर जाना है!

मन रे,अपना कहाँ ठिकाना है?



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रेणु
18 अक्तूबर 2019

मोहित होकर रह निर्मोही, निद्रित होकर भी जागृत!

चुन असार से सार मना रे, विष को पीकर बन अमृत !
काहे सोचे, कौन हमारा,कच्चा ताना बाना है!
टूटा तार, बिखर गई वीणा,फिर भी तुझको गाना है!!!
मन रे,अपना कहाँ ठिकाना है?
वैराग्य भाव जागृत करती भावपूर्ण रचना

Shashi Gupta
17 अक्तूबर 2019

जीवन दर्शन

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में गुरुवार 17 अक्टूबर 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!


आलोक सिन्हा
15 अक्तूबर 2019

यह एक और सरस व् सराहनीय रचना है आपकी | बस ऐसे ही लिखती रहिये | बहुत बहुत शुभ कामनाएं |

कुसुम कोठारी
15 अक्तूबर 2019

परिंदों सी है उडान
पाहुना है मन
इत उत डोलत फिरे
लाखों करो जतन
मन बावरे को कैसे .
बहुत सुंदर सृजन मीना जी
एक एक भाव सटीक और सार्थक।
सुंदर सरस काव्य।

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