बाढ़

18 अक्तूबर 2019   |  व्यंजना आनंद   (2970 बार पढ़ा जा चुका है)

आदरणीय सभी सदस्यों को व्यंजन आनंद का नमस्कार


विषय- -- बाढ़ ।

------------------------

🌹सेमरा का जलकुण्ड🌹

""""""""""""""""""""""""""""

दूरान्त तक,

असीमित यह

जल की प्रचुरता,

मानो एक जलधि ही है।

पर----

निकट से देखा तो-

पाया यह तो स्वयं ही

प्रकृति काल बनकर-

वर्षा का टाण्डव खेल रही है।

वह बाढ़ ले आई है ।

जहाँ गरीबों की झोपड़ियाँ-

और अमीरों के महल

धराशायी हो गये थे।

जीव-जनतुओं ने आश्रय

की आश में दम तोड़ दिये थे।

शायद!

इसी जलपुन्ज में विलुप्त कर।

जहाँ कभी गुंजते थे स्वर-

खुशियों उमंगो के

चहचहाते थे पक्षी जहाँ

घर के मुडेरो पर चढ़कर--

टी .वी,टुट् ,टी .वी. टुट्

कुहू- कुहू-कुहू।

अब नहीं सुनाई पड़ते थे

स्वर विभिन्न पखेरूओ के

अब नहीं सुनाई पड़ती

मस्ती से बहती उमंगती

जल-धाराओं की---

कल-कल ध्वनि ।

छल-छल ध्वनि ।

उदास-----भोर------

और निराश संध्याएँ- -

धूमिल चाँदनी

और मरियल वातास-

उजड़े झोपड़े

और खंडहर बने महल।

जहाँ केवल सुनाई देता

कूहू निशा में उलूकों का

कर्कश स्वर।

रोती माताएँ

बिलखते लाल और

टकटकी लगाए

डबडबाई बूजूर्गो

की आँखें ।

भयंकर , डरावना

सिहर उठता मन,

काँप उठता तन।

यही तो संसार है।

प्रकृति का व्यापार है।।

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✍व्यंजना आनंद (बिहार)

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