विरह की अगन

23 अक्तूबर 2019   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (443 बार पढ़ा जा चुका है)

विरह की अगन

दो दिन गुजर गए-
मुई ये रात भी-
बीत हीं जाएगी।
चलो तुम्हारी
खुशबुओं से,
कल की सुबह-
दमक-गमक जाएगी।।
रौशन शाम;
महक------
सराबोर कर जाएगी।
ग़रीब की झोपड़ी
आशियाना बन,
मुहब्बत की,
मिशाल बन जाएगी।।

डॉ. कवि कुमार निर्मल


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