गीत उगाए हैं

12 नवम्बर 2019   |  मीना शर्मा   (2690 बार पढ़ा जा चुका है)

मन की बंजर भूमि पर,

कुछ बाग लगाए हैं !

मैंने दर्द को बोकर,

अपने गीत उगाए हैं !!!


रिश्ते-नातों का विष पीकर,

नीलकंठ से शब्द हुए !

स्वार्थ-लोभ इतना चीखे कि

स्नेह-प्रेम निःशब्द हुए !

आँधी से लड़कर प्राणों के,

दीप जलाए हैं !!!

मैंने दर्द को बोकर अपने....


अपनेपन की कीमत देनी,

होती है अब अपनों को !

नैनों में आने को, रिश्वत

देती हूँ मैं सपनों को !

साँसों पर अभिलाषाओं के

दाँव लगाए हैं !!!

मैंने दर्द को बोकर अपने....


नेह गठरिया बाँधे निकला,

कौन गाँव बंजारा मन !

जाना कहाँ, कहाँ जा पहुँचा,

ठहर गया किसके आँगन !

पागल प्रीत लगा ना बैठे,

लोग पराए हैं !!!

मैंने दर्द को बोकर,

अपने गीत उगाए हैं !!!

अगला लेख: कहो ना, कौनसे सुर में गाऊँ ?



आलोक सिन्हा
17 नवम्बर 2019

बहुत सरस प्रशंसनीय रचना |

बहुत सुंदर शब्द चयन

शिल्पा रोंघे
13 नवम्बर 2019

बढ़िया मीना जी

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