पानी

17 नवम्बर 2019   |  प्राणेन्द्र नाथ मिश्रा   (3281 बार पढ़ा जा चुका है)

पानी:-


नमी ज़िंदगी में नहीं अब रही है
,
बहुत खुश्क
, बेदम, हवा बह रही है,
“अगर प्यार करता है बच्चों से अपने
बचा ले तू पानी”
, फिजा कह रही है..


नहीं काम आयेगा रुपया या पैसा
,
गला कर इन्हें तू न पी पायेगा
,
बदन में हुयी गर कमी पानी की तो
ऐ मरदूद ! जीवन न जी पायेगा..


न बर्बाद कर पानी की बूंद कोई
,
न नदियों को बदहाल कर
, कूड़ा भर के
अगर सूख जायेंगी नदियाँ, समझ ले!
न पायेगा पानी तू चाहे भी मर के..


तलैय्यों को तालों को भर कर बना ले
गगनचुम्बियाँ तू जितना भी चाहे
,
मगर आसमाँ पर न पायेगा पानी
तू कितना भी बादल, गले से लगाए...

धधकती ज़मी सूखती जा रही है
,
फसल जब न होगी तो क्या खायेगा तू
?
मवेशी भी सूखे और मायें भी सूखी
क्या ज़हर बचपने को पिलाएगा तू !

अभी वक़्त है
, बात इतनी ही सुनले,
कि कर खेती अब पानी की भी ज़मीं पर
,
नहीं तो समझ ले कि आगे की नस्लें
लड़ कर मरेगी पानी ही की कमी पर...


--प्राणेन्द्र नाथ मिश्र


अगला लेख: सुतहीन करो इस धरती को



Ravindra Kumar Karnani
18 नवम्बर 2019

" कर खेती अब पानी की भी ज़मीं पर" बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

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