एकाकी मुझ को रहने दो

23 नवम्बर 2019   |  मीना शर्मा   (445 बार पढ़ा जा चुका है)

एकाकी मुझको रहने दो.

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पलकों के अब तोड़ किनारे,

पीड़ा की सरिता बहने दो,

विचलित मन है, घायल अंतर,

एकाकी मुझको रहने दो।।


शांत दिखे ऊपर से सागर,

गहराई में कितनी हलचल !

मधुर हास्य के पर्दे में है,

मेरा हृदय व्यथा से व्याकुल

मौन मर्म को छू लेता है,

कुछ ना कहकर सब कहने दो !

एकाकी मुझको रहने दो।।


कोमल कुसुमों में,कलियों में,

चुभते काँटे हाय मिले,

चंद्र नहीं वह अंगारा था,

जिसको छूकर हाथ जले,

सह-अनुभूति सही ना जाए

अपना दर्द स्वयं सहने दो !

एकाकी मुझको रहने दो।।


यादों के झरने की कलकल

करती है मन को विचलित !

क्या नियति ने लिख रखा है,

जीवन क्यूँ यह अभिशापित ?

गाए थे हमने जो मिलकर

उन गीतों को अब रोने दो !

एकाकी मुझको रहने दो ।।


पलकों के अब तोड़ किनारे,

पीड़ा की सरिता बहने दो, !

विचलित मन है, घायल अंतर,

एकाकी मुझको रहने दो।।


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आलोक सिन्हा
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अच्छी रचना है |

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