सुतहीन करो इस धरती को

30 नवम्बर 2019   |  प्राणेन्द्र नाथ मिश्रा   (405 बार पढ़ा जा चुका है)

सुतहीन करो इस धरती को..


दग्ध देह
, धर्षित शरीर,
जलता चमड़ा
, वह मूक चीख,
मानव कितना कायर है रे !
पुरुषत्व
, नपुंसक का प्रतीक..

जो पुरुष नृशंस हुआ कामी
अब शब्द नहीं उसका निदान
,
अब तर्क-वितर्क नहीं कोई
हे भीड़ ! हरो सत्वर वो प्राण...

अब नष्ट करो वह पापात्मा
जो मानव को ना पहचाने
,
अधिकार नही जीने का उसे
पर्याय काम
, जो स्त्री माने...

हे माओं ! दग्ध दुग्ध कर दो
जन्मे न दुशासन अब कोई
,
सुतहीन करो यह कोख प्रथा
निर्भय हो धरा पर सब कोई...

---प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

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