सृजन.....!

18 दिसम्बर 2019   |  परमजीत कौर   (424 बार पढ़ा जा चुका है)

सृजन.....!

ज़िंदगी है ,

बनती- बिगड़ती हसरतें , जो पूरी न होने पर भी

नए सृजन की ओर इशारा करती हैं।

सुबह की ओस की वे बूँदें , जो चंचलता से पत्तों पर

थिरकती मिट्टी में समां जाती हैं ,

तो कहीं सूखे पत्तों- सी चरमराती

ज़िंदगी, नया बीज पाकर फ़िर से

खिलखिलाती है।

बचपन के किस्से ,कहानियों से निकल ,

ज़िंदगी जैसे डायरी के पन्नों में समां गई।

हर पन्ना जीवन के अनुभवों को अपने में समेटे

दूसरे पन्ने पर जाने की राह दिखाता है।

हर पन्ने पर

एक अलग कहानी

गुदगुदाती , मुस्कुराती ,

कुछ दर्द, जो सबक बन , आगे चल कर मील का पत्थर भी साबित हुए।

जख़्म भी मिले और मरहम भी …

शतरंज की बिसात भी बिछी ,

चालें भी चली गईं

पर जीत समर्पण और जुनून की हुई ।

जाना कि ज़िंदगी संक्षिप्तता नहीं पूर्णता है।

तभी एक तितली आकर डायरी के उस पन्ने पर बैठ गई

कुछ लिखने ही वाली थी, जिस पर

अपने रंग बिखेर कर ,

वह पुनः सृजन का संदेश देती उड़ गई।


मेरी कलम से

परमजीत कौर


18 . 12 . 19

अगला लेख: शब्द ......!



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
दो
12 दिसम्बर 2019
बे
28 दिसम्बर 2019
11 दिसम्बर 2019
12 दिसम्बर 2019
16 दिसम्बर 2019
लो
09 दिसम्बर 2019
मो
22 दिसम्बर 2019
गु
27 दिसम्बर 2019
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x