वह लड़की

18 दिसम्बर 2019   |  सुकीर्ति भटनागर   (6587 बार पढ़ा जा चुका है)

वह लड़की

जूठे बर्तन साफ़ करती वह,

दूध के बर्तन की चिकनाई चेहरे पर मलती है।

कपड़ों के मैले बचे सर्फ़ में पैर डाल

उन्हें रगड़ती है, धोती है।

झाड़ू लगाते समय

आईने में स्वयं को निहारती

चुपके से

मुँह पर क्रीम या पाऊडर लगा

मंद मंद मुस्कुराती है।

तो कभी इंद्रधनुषी कांच की चूड़ियों को

अकारण ही बार बार पोंछती, सहलाती

उदास हो जाती है।



मैं,

सब देखती हूँ, पर कुछ कह नहीं पाती

क्योंकि वह केवल शरीर नहीं,

अपेक्षाओं और आकांक्षाओं से भरा कोमल मन है

जो निर्धनता की तपती रेत पर मृगतृष्णा सा भ्रमित हुआ

कुछ पल (उधार के ही सही)

जीना तो चाहता है।



वह केवल एक लड़की नहीं

कमसिन उम्र के पड़ाव की

मनःस्थिति है।

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© सुकीर्ति भटनागर , चेतना के स्वर, प. १४

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रेणु
22 दिसम्बर 2019

बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना सुकीर्ति जी| सस्नेह शुभकामनाएं | शब्द नगरी में आपको पढ्ना अच्छा लगा

रेणु जी, उत्साहवर्धन के लिए अनेकों धन्यवाद!

शिल्पा रोंघे
20 दिसम्बर 2019

सुंदर रचना सुकीर्ती जी

बहुत बहुत धन्यवाद शिल्पा जी।

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