स्वतंत्रता

19 दिसम्बर 2019   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (6256 बार पढ़ा जा चुका है)

बंद पिंजड़े से निकल जब पँक्षि

आजाद हो गगन पार जाता है।

मन की समस्त 'कुण्ठाओं' को

पिंजड़े में छोड़ वह आह्लादित

हो गुनगुनाते उड़ता जाता है।।

बँधनों से मुक्त हो- घुटन से निकस वह

मुक्त प्राणी बन अराध्य तक जाता है।।।

डॉ. कवि कुमार निर्मल

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बे
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩बेटा बचाओ- बेटी बहु बन कहीं जा घर बसाएगी!जो बहु बन आए वह क्या (?) ''बेटी'' बन पाएगी!!सुसंस्कार वरण कर पिया का घर-संसार बसाएगी!उच्च घर में जा कर वह निखरेगी वा सकुचाएगी!!विदा करते तो शुभ कहते पुरोहित् अभिवावक हैं!माँ-बाप का हुनर समेटे, वही बनती बड़भागिन है!!बेटा पास बैठ
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येसु फिर आओ ★★मसीहा फिर आओ★★येसु! बार - बार आ कर आलोक फैलाओअँधेरा छाया- फिर से ज्योत बिखराओतुमने सदा प्यार बाँट शुभ संदेश दिया हैहमने बँट कर नफ़रतभरा अंजाम दिया हैचमत्कार फिर दिखला कर होश में लाओप्रायश्चित और प्रार्थना का मार्ग बताओयेसु! बार - बार आ कर आलोक फैलाओअँधेरा छाया- फिर से ज्योत बिखराओडॉ.
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