मैं और मेरा प्रियतम

19 दिसम्बर 2019   |  सुकीर्ति भटनागर   (6248 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं और मेरा प्रियतम

दूर कहीं अम्बर के नीचे,

गहरा बिखरा झुटपुट हो।

वहीं सलोनी नदिया-झरना

झिलमिल जल का सम्पुट हो।




नीरव का स्पंदन हो केवल

छितराता सा बादल हो।

तरुवर की छाया सा फैला

सहज निशा का काजल हो।




दूर दिशा से कर्ण - उतरती

बंसी की मीठी धुन हो।

प्राणों में अविरल अनुनादित

प्रीत भरा मधु गुंजन हो।




उसी अलौकिक निर्जन स्थल पर

इठलाता सा यह मन हो।

दूर जगत की दुविधाओं से

मैं और मेरा प्रियतम हो।




© सुकीर्ति भटनागर, चेतना के स्वर, प. १२

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रेणु
22 दिसम्बर 2019

वाह ! प्रेमासिक्त मन की मधुर अभिव्यक्ति!!!!!!

अलोक सिन्हा
21 दिसम्बर 2019

बहुत अच्छी सुगठित रचना है |

धन्यवाद अलोक जी.

वाह... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

धन्यवाद आपका

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