साथी

21 दिसम्बर 2019   |  शिल्पा रोंघे   (392 बार पढ़ा जा चुका है)

साथी उसे बनाओं जो सुख दुख में साथ दे.

ना कि उसे जो सिर्फ तस्वीरों में आपकी शोभा बढ़ाएं.


शिल्पा रोंघे

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31 दिसम्बर 2019
सा
चंद्र की शुभ्र किरणेंले रही विदा दुल्हन की तरह.रात्री की डोली मेंबैठकर उन्हें सूर्योदय के घर जाना है.तम तो प्रकाशतक जाने का प्रतिदिन का साधन है.किंतु आज पिछले बरस कोसबको नवीनवर्ष से मिलवानाहै.शिल्पा रोंघे
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31 दिसम्बर 2019
सौम्या यही नाम था उसका,हमारे पड़ोस में रहने वाले तिवारी जी की बेटी थी।आज उसे घर लाया जा रहा था, कहां से? कहीं बाहर गई थी क्या सौम्या? हां, पिछले कई दिनों से दिखी भी नहीं थी।मैंने पूछा भी था,तो टाल-मटोल वाला जबाव मिला था, लेकिन आज सारी कहानी सामने थी। आठवीं में ही पढ़ती थीसौम्या! बड़ी चुलबुली और प्या
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02 जनवरी 2020
तन्हाई किसी की मुस्तकबिल न होखुशियां इतनी भी मुश्किल न होऔर पाने की आशा होअंतिम लक्ष्य हासिल न होप्यार तो सच्चा होलेकिन उसकी मंजिल न होप्रेम में डूबा होस्नेह-सरिता का साहिल न होमन में समर्पण होमहबूबा संगदिल न होज्ञान का भंडार होपर मानव जाहिल न होउससे भी प्यार होजो उसके काबिल न हो .................
02 जनवरी 2020
24 दिसम्बर 2019
“चकाचौंध” पत्रिका अपने प्रकाशन के चार साल पूरेकर चुकी थी, किसी को उम्मीद भी नहीं थी कि इस पत्रिका की बिक्री इतनी बढ़ जाएगी,अब ऐसे में सभी सदस्यों को मीटिंग में बुलाया गया और उनके योगदान के लिए बधाई दीगई। तभी मीटिंग में एक व्यक्ति ने पत्रिका
24 दिसम्बर 2019
01 जनवरी 2020
किसी की मोहब्बत में खुद को मिटाकर कभी हम भी देखेंगे अपना आशियां अपने हाथों से जलाकर कभी हम भी देखेंगे ना रांझा ना मजनूं ना महिवाल बनेंगे इश्क में किसी के महबूब बिन होती है ज़िंदगी कैसी कभी हम भी देखेंगे मधुशाला में करेंगे इबादत ज़ाम पियेंगे मस्ज़िद में क्या सच में हो जायेगा ख़ुदा नाराज़ कभी हम भी देखेंगे
01 जनवरी 2020
30 दिसम्बर 2019
नू
वहीं खड़े है वृक्ष सभी तनकर.वहीं खिल रहे है फूल सुंगध फैलाकर.सदियों से वहीं खड़े पर्वत विशाल.उसी समुद्र में जाकर मिल रही तरंगिणी.उसी डाल पर बैठा है पक्षी घरौंदा बनाके,उसी नभ में उड़ रहा है पंख फैलाकर.कुछ नहीं बदलता नवीन वर्ष के साथ हां बस संकल्प निश्चित ही हो जाते है दृढ़.बीते वर्ष में मिली सीखें मा
30 दिसम्बर 2019
02 जनवरी 2020
शेरनी भी पीछे हट गयीबछड़े की मां जब डट गयीहमारी कलम वो खरीद न सकेलेकिन स्याही उनसे पट गयीहमारे मुंह खोलने से पहलेदांतों से जीभ ही कट गयीसच बोलने लगा है अब वोसमझो उमर उसकी घट गयीगौर से देखो मेरे माथे कोबदनसीबी कैसे सट गयीकमीज तो सिला ली हमनेलेकिन अब पतलून फट गयीउसने गले से लगाया ही थाकमबख़्त नींद ही उच
02 जनवरी 2020
17 दिसम्बर 2019
हर बार सच्चाई की सफाई देना जरुरी नहीं.कभी कभी सही वक्त सब कुछसाफ कर देता हैअपने आप ही.सूरज को ढकनेकी कोशिश करता हैबादल हर कभी, लेकिन उसे रोशनी देनेसे रोक सका हैक्या वो कभी.शिल्पा रोंघे
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18 दिसम्बर 2019
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बढ़ती जनसंख्या परस्वास्थ्य सुविधाएं पड़ रही कम.महंगी हुई शिक्षा और अच्छे स्कूल हुए कम.ट्रेनों में बैठने को हुई जगह कम.महानगरों में रहने को मकान पड़ रहे कम.पेड़ और पौधे हुए कम.पीने का पानी हुआ कम.सिकुड़ रहे खेत खलिहान, अनाज हुआ कम.बढ़ रही गरीबी और महंगाई.किसी ने धर्म को तो किसी ने जातिको देश की बदहाल
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भेजा था विष का प्याला अमृत बन गया। भेजा था विषैला सांपफूलों का हार बन गया। तेरी ही करामात है ये मोहनकि कलियुग में भी जी रही हूं। बिना डरे तेरी भक्ति के गीतगा रही हूं। शिल्पा रोंघे
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आसान नहीं है ज़िंदगीजीने का तरीका सीखलाना.आसान नहीं किसी कोसही राह दिखाना.आसान नहीं है खुद को भी बदलना, कुछ ख़्वाहिशोंको छोड़ना, कुछ सुविधाओं को त्यागना.त्याग की अग्नी में तपना औरउम्मीद के दीपक जलाना.धूप, बारिश, और ठंडको सहना.होंठो पर शिकायत कम और समाधाननिकालना.हां सचम
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