माँ की वेदना

22 दिसम्बर 2019   |  अनु ठाकुर   (5426 बार पढ़ा जा चुका है)


आज एक गर्भवती महिला मेरे क्लीनिक में आई

और गर्भ परीक्षण के लिए मुझ पर दबाव बनाई ,

मैंने बोला गर्भ परीक्षण कानूनन जुर्म है

अगर तुम्हें लड़की होगी तो शायद तुम गिरा दोगी

बेटा ही घर का नाम रोशन करें यह जरूरी तो नहीं

बेटियां भी घर का नाम रोशन करती हैं

तो वह बिफर गयी और चिल्लाते हुए बोली

हे अंधे इंसाफ और बहरे कानून के अंपग रखवाले,

जब तुम सुनसान रात में जलती हुई बेटी की

चीत्कार नहीं सुन सकते हो तो . . :

फिर बेटियों को कोख में ही बचाने का

स्वांग क्यों भरते हो ?

क्यों चाहते हो वो जन्म ले ?

क्यों वे इस धरती पर आए ?

क्यों क्यों वे भेड़ियों का शिकार बने ?

क्यों वे अपनी अस्मिता अपना जीवन गवाएं ?

क्यों चाहते हो तुम कि वे प्यार में ठोकर खाए ?

और तुम्हारी हवस की पूर्ति के लिए

कोठों की जीनत बन जाए।

क्यों चाहते हो कि वह पति से ससुराल में प्रताड़ित हो

और दहेज के लिए जान गवाए ?

जब इन कुकर्मो से तुम्हारे इन प्यारे

बेटों की इज्जत कम नहीं होती है ?

तो फिर इज्जत का पूरा उत्तरदायित्व

बेटियां ही अपने कंधों पर क्यों ढोती हैं ?

क्यों इन हैवानो के छूने से कलंकित बेटियां होती हैं?

क्यों इन कुछ है हैवानों के कारण

पूरी पूरी पुरुष जाति शर्मिंदा होती है ?

मरने दो बेटियों को कोख में . . .

क्या करने वे धरती पर आएंगी ?

इन भेड़ियों से भरे समाज में ....

वैसे भी जी नहीं पाएंगी

कम होने दो बेटियों की संख्या

होने दो विलुप्त इन्हें

शायद तभी इनकी अहमियत

लोगों की समझ में आएगी

तब तब फिर से इनकी पूजा होगी

और ये समाज में सही स्थान पाएंगी।

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