सैलाब

23 दिसम्बर 2019   |  नीरज चंदेल   (5197 बार पढ़ा जा चुका है)

इंसान की कीमत दूनिया में कुछ भी तो नहीं रह गई है,

इंसानियत की लत स्वार्थ के सैलाब में कहीं बह गई है.

किसी को किसी के दर्द से कोई पीड़ा नहीं होती यहां,

अपना अपना राग अपनी अपनी डफली ही रह गई है,

झूठ और बेईमानी का जाल फैल चुका है चारों तरफ,

सच्चाई और ईमानदारी की इमारत तो जैसे ढह गईं है.

ईर्ष्या का छाया कहर है लालच ने बसाए कईं शहर हैं,

कैसे भूल गए हम, ऋषियों की वाणी कया कह गई है.

आइए खुद से शुरूआत करते हैं बुराई को मात देते हैं,

उठो अब वीरो,अच्छाई ने जो सहना था वो सह गई है.



नीरज चंदेल
03 जनवरी 2020

धन्यवाद शिल्पा जी

शिल्पा रोंघे
30 दिसम्बर 2019

बढ़िया रचना

नीरज चंदेल
25 दिसम्बर 2019

धन्यवाद आचार्य जी

बहुत सुंदर रचना

नीरज चंदेल
25 दिसम्बर 2019

धन्यवाद रेणु जी .

रेणु
23 दिसम्बर 2019

ईर्ष्या का छाया कहर है लालच ने बसाए कईं शहर हैं,
कैसे भूल गए हम, ऋषियों की वाणी कया कह गई है.
बहत खूब प्रिय नीरज जी

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x