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01 जनवरी 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (444 बार पढ़ा जा चुका है)

लो बिन कहे मैं चुपके से आ गया हूँ

ख़्वाबों को सबके- सजाने आ गया हूँ

तिलस्म नहीं, "सच" बन आ गया हूँ

"चार" का मेरा यह आकड़ा नायाब हूँ

शुन्य से निकसा हुआ स्वर्णिम प्रभात हूँ

हर दिल की तमन्ना बन छा गया हूँ

२०२० सतयुग लिए मैं आ गया हूँ

विश्व के नैतिकवादियों को समेट लाया हूँ

जाती-शरहदों को मिटाने आ गया हूँ

लबों की मुस्कराहट बन के छा रहा हूँ

लो बिन कहे मैं चुपके से आ गया हूँ

ख़्वाबों को सबके- सजाने आ गया हूँ


डॉ. कवि कुमार निर्मल

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