ना कोई अपना हुआ

06 जनवरी 2020   |  शिशिर मधुकर   (5332 बार पढ़ा जा चुका है)

यूं तो दीवाने कई पर ना कोई अपना हुआ

सोचते ही रह गए बस पूरा ना सपना हुआ


ढूंढते ही रह गए हैं ना खुदा मुझको मिला

उम्र गुज़री जाए है बेकार जप जपना हुआ


कोई पढता भी नहीं चाहे रहूं मैं सामने

बेवजह अखबार में देख लो छपना हुआ


अजनबी सा अब वो पेश आ रहा है दोस्तों

बेकार ही अपना तो उसके साथ में खपना हुआ


सोचते थे ओट उसके प्यार की मिल जाएगी

मधुकर मगर बेकार तेरा तनहा यूं तपना हुआ



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