तुम कौन हो?

18 जनवरी 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (370 बार पढ़ा जा चुका है)

तुम कौन हो?

🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚
बाल रूप में तुम प्रभु,
एक जैसे हीं लगते हो।
गुरुकुल में तुम अलग-
अलग से हीं दिखते हो।।
कभी "बरसाने" में रास रचाते
कभी लंका दहन करवाते हो।
कभी सुदामा के कच्चे चावल खाते,
कभी भीलनी के जूठे बैर खाते हो।।
शांत समाधि में कभी दिखते,
कभी ''त्रिनेत्रधारी'' बनते हो।
कभी दानव का वध तुम करते,
कभी भस्मासुर से डर जाते हो।।
महिमा तुम्हारी अपरम्पार प्रभु,
रहस्यमयी लीलाधर बनते हो।
भक्तों को तुम 'एकोहम् बहुस्यामि'
उचर कहीं जा कर छुप जाते हो।।
🙏डॉ. कवि कुमार निर्मल 🙏


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