पतझड़ से वसंत तक

07 फरवरी 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (418 बार पढ़ा जा चुका है)

पतझड़ से वसंत तक

🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵

कभी पतझड़ के थपेड़ों से,

मुरझा, झुक तुम जाते हो!

🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

कभी वसंत की हवाओं से,

मिल-जुल के मुस्कुराते हो!!

🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀

🌞🌝🌞🌝🌞🌝🌝🌞

सूरज की तपिश सह कर भी,

फल-फूल डाल के लहराते हो!

🌸🌷🌹🌻🌺🌻🌹🌸

सावन-भादो की बौछारों से,

झूम-झूम तुम इतराते हो!!

⛅⚡☁☔☁⚡⛅

सर्दियों के दस्तक के पहले हीं,

सिकुड़-जम बौने बन जाते हो!

🌊🌊🌊🌊🌊🌊🌊🌊

वाह रे दरख्त, तुम कुदरत का-

हर आइन क्या खूब निभाते हो!!

🌲🌳🌲🌳🌲🌳🌲🌳

🙏डॉ. कवि कुमार निर्मल🙏

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