सुस्वागत वसंत

08 फरवरी 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (424 बार पढ़ा जा चुका है)

सुस्वागत वसंत

"सुस्वागत वंसत"


हरित-क्रांति की,
प्रज्ज्वलित मशाल
पिली सरसों दृष्ट सर्वत्र,
जिव-जंतु,
समस्त विश्व.
संपन्न-खुशहाल,
प्रलय का भय त्याग,
निर्भयता का करो वरण,
अशुभ भाव त्याज्य, शुभ हों विचार
स्वागत करतें है दृष्ट-अगोचर,
सुहावन, 'ॠतु-बसंत बहार'
माँ सरस्वती की रहे अहेतुकी कृपा,
हो नित्य अद्भुत चमत्कार
शुभारम्भ करो,
पठन-पाठन का,
अविलम्ब प्रारंभ करो,
ज्ञान का विशुद्ध व्यापार
छिन्न-भिन्न, शेष हो शिध्र-
वसुंधरा में व्याप्त तिमिर-अन्धकार
शुभ-एषणा वरणीय हो मात्र,
मानवता की ग्रीवा में हो विजय-हार
सद्-विप्र जीवन का यह पूर्वाभास,
विश्व-बंधुत्व का यह प्रबल आधार
जड़-चेतन का हो संस्कार-क्षय
खुल जाये सबके मुक्ति-द्वार
शत्रु-मित्र खाएं नित्य स्वरुचि प्रीति-भोज,
समस्त विश्व का हो बेड़ा पार
मेरी करबद्ध विनती दिव-निशि,
मित्रों से बारम्बार...
त्याग करो द्वेष, ध्रिणा,
हिंसा-प्रतिहिंसा का हृदय-मस्तिष्क से,
विनाशकारी अशुभ विचार....
शुभम्!


डॉ. कवि कुमार निर्मल


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