मुक्तक

10 फरवरी 2020   |  महातम मिश्रा   (383 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्तक"


व्यंग ढंग का हो अगर, तो करता बहुमान।

कहने को यह बात है, पर करता पहचान।

भागे भागे क्यों फिरे, अपने घर से आप-

और दुहाई दे रहे, मान मुझे मेहमान।।


बनी बनाई रोटियाँ, खाता आया पाक।

अब क्या तोड़ेगा सखे, लकड़ी जल भइ खाक।

जाति-पाति के नाम पर, चला रहा है राज-

कहाँ अन्य को दे दिया, अपने जैसी धाक।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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