दधीचि

11 फरवरी 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (2653 बार पढ़ा जा चुका है)

दधीचि

"ऋषि दधीचि" सम बन तुम देवों को तारो

"चरैवेति-चरैवेति" का अमोध "मंत्र" उचारो

"पूर्ण समर्पण" कर सर्वस्व अराध्य पर वारो

बन जाओ तुम श्री कृष्ण सम--प्यारो-न्यारो

"नीलकण्ठ" सम बन कर पीयो हलहल सारो

**************************

"देती रहती है नदी--मीठा जल होता है

लेता रहता है सागर--जल खारा होता है

ठहर कर नाली का जल मैला हीं रहता है

शीतलता दे कर भी चाँद कलंकित होता है

सुवासित पुष्प मुरझा कर- कूड़े पर दिखता है

दानवीर मानव वह है जो- चलता हीं रहता है

सद्-विप्र वही बन धर्म-युद्ध में विजयी होता है

*******डॉ. कवि कुमार निर्मल********

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