कवि

12 फरवरी 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (420 बार पढ़ा जा चुका है)

कवि


मनन-चिंतन, पठन-पाठन में अग्रसारिता गह,
बुद्धिजीवी कोई बन पाता है।
तुकबंदी, कॉपी-एडिट वा कुछेक लकिरें उकेर,
कवि कोई बन नहीं सकता है।।
जन्मजात संस्कारों की पोटली
गर्भ से हीं कवि साथ लाता है।
मानसिकत: परिपक्व हो मचल-
उछल कर अभिव्यक्ति करता है।
कवित्व स्वत: स्फुरित-स्फुटित हो,
'रचनाकार' निखर उभरता है।।
आलोचना नहीं विवेचना हीं
कवि का संबल होता है।
कवि गोष्ठियों में सृजन शक्ति का
परिमार्जन होता है।।
कल्पना जगत का पथिक,
अनवरत सृजन वह करता है।
"जाति-भाषा-सिमाओं" के
'चक्रव्यूह' से विलग रहता है।।
धन्य-धन्य हे कवि तू
विशुद्ध चक्र में विचरता है।
जन हित में हीं कवि
श्रेष्ठ सृजनकर्ता बनता है।।


डॉ. कवि कुमार निर्मल

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