प्रकृति रहस्य

18 फरवरी 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (1938 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रकृति रहस्य

🕉️🕉️🕉️🐚🐚सृष्टि-रहस्य🐚🐚🕉️🕉️🕉️
‘महाशुन्य’ ‘ब्रह्म-एषणा’ की छद्म अभिव्यक्ति!
"व्यष्टि" में लुप्त हुई समस्त- अव्यक्त "समष्टि"!!
धूम्र-वर्ण निहारिका, अपार व्योम दृष्टव्य सारा!
चकाचौंध तारे, हटात् उभरा अशुभ पुच्छ्ल तारा!!
धूम्रकेतु- सप्त-ॠषि- मनोहर निहारिकायें
अतुल सृष्टि का मनमोहक अद्भुत भण्डारण!
सौर्य-मण्डल मात्र एक सहस्रांश सकुंचित भूमामन
अणु-चेतन अभिव्यक्त-अव्यक्त प्रकुंचन-विस्तारण!!
अदृष्ट सरल तरंगे परिव्याप्त- चराचर,
ब्रह्माण्ड की अद्भुत यह विशाल रचना!
अत्यंत क्लिष्ट
पठन-पाठन-सृजन स्वप्न है अपना!!
उस अनंत का यह भूमण्डल- समूह,
वसुंधरा का जल-थल-नभ का विस्तारण!
प्रभु का अदृश्य अव्यक्त, आमन्त्रण!!
सृष्टि के नियम विचित्र, स्वतः नियंत्रित
सुकृत हो, अपभ्रंश वा विकृत,
ब्राह्मि-भाव से अभिमंत्रित;
पञ्च-तत्व से मानव रचना!
मानव मन की सिमित परिधि,
आश्चर्यजनक है यह बिधना!!
संस्कार अर्जन-क्षय की रचना!!!
कर्म, प्रारब्ध समस्त निश्चित!
सृष्ट-जगत संभव, हो कुपित!!
महाविनाश का भय करता विचलित!
चिंता की गति, क्यों ना हो त्वरित!!
सम्मोहन, उच्चाटन, वैराग्य अनूठा!
किंकर्तव्यविमूढ़ मानव मन
अंगीभूत करता पूजन-पथ!!
महासम्भूति का सामयिक मार्ग-दर्शन!
सत्य नहीं किंवा, है मिथ्या,
असंभव दो तारक ब्रह्मों का समकालीन अवतरण!!
सुक्ष्म-स्थुल का अविराम चिंतन-मनन!
सृष्ट-जीव अणु-परमाणु का मात्र कायांतरण,
अवतरित होता संयुक्त अणु-चेतन!!
आसक्ति-विरक्ति का अस्पष्ट अंतर्द्वंद्व!
आदि-अंत का रहस्य ज्ञान-
विज्ञान की अनंत अभिलाषा!!
बुद्धिजीवी की अंनंत जिज्ञासा
मृत्युकाल में भी ज्ञान पाने की आशा!!!
आत्म-उत्सर्जन, कायांतरण का वृहत अभेद्य चक्र!
मस्तिस्क सिमित, मार्ग सहज नहीं अत्यंत है वक्र!!
झंझावात का उग्र-दंभ प्रचण्ड समन दृष्टिगत्!
बड़वानल की भीषण-अग्नि समन का भ्रम!!
सम्पूर्ण अस्तित्व हुआ आत्मसात्!
अप्राप्य ज्ञान प्राप्य, भविष्य में संभव!!
प्रभु-चरण में कर पुर्ण-आत्म-समर्पण!
क्लिष्ठ सत्य, सुलभ बन हो मुक्त मन,
जीव-मनसा हो किंवा पारदर्शी दर्पण!!
आत्मा-परमात्मा का यह अद्भुत मिलन!
संकट-मोचन का साक्षात परचम्,
मोक्ष-द्वार का संभव शुभ-चिंतन!!
🙏🙏डॉ. कवि कुमार निर्मल🙏🙏


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