बेटी

27 फरवरी 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (292 बार पढ़ा जा चुका है)

बेटी

बेटी


बेटे से बाप का बटवारा

युगों से होता चला आया है!
माँ को बाप से विलगा- श

पीड़ा तक भी बटवाया है!!
उसर कोख का ताना ले

कोर्ट का चक्कर मर्द लगता है!
कपाल क्रिया कर वह

आधे का हक सहज पा जाता है!!
बेटी सिंदूर लगवा

एक साड़ी में लिपट साथ हो लेती है!
माँ-बाप का दु:ख सुनते हीं

वह दौड़ी चली आती है!!
मरने पर वह साथ न हो,

आ आसूँ ले कर जाती है!!!
बेटा होने पर कुलबा सारा

खुश हो कर जश्न मनाता हैं!
बेटी हो तो सौ घड़ा सर पर

ज्यूँ पड़ा, अश्क बहाता हैं!!
हजार ₹ में अवैद्य जाँच

लिंग भेद जान, गर्भपात रे करवाते हैं!
मायें अनेक वेदना- अतिरक्तश्राव से

बेमौत रोज मर जाती हैं!!

बेटी का भ्रूण यह मर्म

भलिभाँति समझता है!
कलप-चींख कर जीवन की

भीख मांगता है!!
आधुनिकता का साया

आज विकराल हुआ है!
भ्रूण हत्या हुई सरयाम चाहत,

व्यापार बड़ा है!!
कानून तुम कितने भी बदल,

उलट-पलट डालो!
महापाप कर कचरे के

डब्बों में लोथड़ा डालो!!
काली-दुर्गा-रणचण्डी माँ

का खप्पर अब चलेगा!
"नभ्य मानवाद" का

चहुदिसी शंख गुँजित होगा!!
नहीं गर चेतोगे दुनिया वालों,

नारी पृथ्वी पर दुर्लभ होगी!
हर घर में होगी द्रौपदी,

चीर-हरण की पीड़ा दारुण होगी!!


डॉ• के• के• निर्मल

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