ऊँचे सपने

18 मार्च 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (280 बार पढ़ा जा चुका है)

ऊँचे सपने

उँचे सपने बिखर जाते हैं-

बालू के टिब्बे की तरह!


संतोष के गहने-

चमक जाते हैं

सोने की तरह!!


DrKavi Kumar Nirmal

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