कृष्ण लीला

21 मार्च 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (272 बार पढ़ा जा चुका है)

कृष्ण लीला

🐚🐚 कहानी कृष्ण की 🐚🐚
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"कृष्ण जन्माष्टमी" हम हर्षित हो मनाते हैं।
"कृष्ण लीला" आज हम सबको सुनाते हैं।।
कारागृह में ''महासंभूति'' का अवतरण हुआ।
दुष्ट कंस का कहर, जन जन का दमन हुआ।।
जमुना पार बासु यशोधा के घर कृष्ण को पहुँचाये।
''पालक माँ'' को ब्रह्माण्ड मुख गुहा में प्रभु दरसाये।।
बाल लीला में नटखट माखन चोर की अद्भूत कहानी।
चितचोर" बने वे, सारे जग ने यह बात अंततः मानी।।
बरसाने की "रास" काव्यकारों को बहुत हीं भाई।
गोप - गोपियों से युक्त प्रिय सखा गो -पालक साईं।।
कंस भयावह-महापातकी, जीव कल्याण में था बाधक।
चरितार्थ पथ पर कृष्ण कृपा सें अग्रसारिता हों साधक।।
*उग्रसेन को राजा बना कंस वध किए, हटाई सारी बाधा।
अधर्मी कंस को मार धर्म के बने कल्पतरु सहारा।।
गोकुल - बृंदावन से मथुरा गये प्रियतम् पालनहारा।
बांसुरी बजाई तो झूम उठे समस्त बाल और बाला।।
कुरुक्षेत्र एवं महाभारत को कैसे हम भला अलगाएं।
*पार्थ सारथी का सत्य, कतिपय तथ्य हम जान पाएं।।
यह "पार्थ" शब्द आखिर किस (?) इतिहास से आया।
"पृथा" राज्य की कन्या "कुंतीपुत्र" अर्जुन कहलाया।।
आर्यों के पूर्व अस्ट्रिक-द्राविड़ इधर, जनगोष्टियां' उभरीं
मां श्रेष्ठ मातृगत् व्यवस्था- पांडवों को कौंतेय पुकारी।।
छल-अत्याचार, द्रौपदी-चिरहर- धर्म पर अतिभारी।
पार्थ-सारथी बन कृष्ण कुरुक्षेत्र में रथ दिशा संभाली।।
अंत: सुदर्शन-चक्र एवं खप्पड़-कुरुक्षेत्र था खाली।
इति! लीला अनंत- धर्म विजय सुनिश्चित- अवश्यंभावी।।
गीता उपदेश और विराट रूप सिद्ध हुआ बहुत प्रभावी।
अष्टमी की रात अमावस्या पर कृष्ण गौर- रात्रि काली।।
राधा त्याग, बांसुरी थमाए- भूले उसे भी जो थी पाली।।।
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🙏🙏 डॉ. कवि कुमार निर्मल 🙏🙏


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