इंद्रधनुष

25 मार्च 2020   |  आद्या कात्यायनी   (248 बार पढ़ा जा चुका है)

इंद्रधनुष

चिड़िया ने जब वर्षा के बाद सर उठाया,

सामने चमचमाता हुआ इंद्रधनुषी दृष्य पाया ।

घोंसले से देखा उसने दूर वादियों में,

विशाल रंगबिरंगी काया दो पर्वतों के बीच में ।

उस तक पहुंचने की चाह में बेसुध उड़ चला

इच्छा तीव्र हो तो भूख-प्यास क्या भला ?

रास्ते में सर्द हवा, चील, बाज सबसे लड़ लिया,

लहू-लुहान , थका, कांपता लक्ष्य पर अमल किया ।

पहुंचा जब अधमरा - सा वह पर्वत पर,

सर घुमा-घुमा कर खोजा उसने पूरा शिखर ।

पर यह क्या ? इंद्रधनुष तो वहां था ही नहीं,

असमंजस में सोचा उसने, देखा मैंने उसे यहीं ।

दम भर कर उसने फिर से दूर उड़ान भरी,

पलटा तो देखा वहीं थी सप्तरंगों की लड़ी ।

खुशी से फिर उसके बीच में जाना चाहा,

उसके शीतल रंगों में अपनी विजय को रंगना चाहा ।

पर पास पहुंचते ही वो लुप्त हो गया,

तब जाना उसने कि आंखों का धोखा हो गया ।

जिसे पाने के लिये प्राण देने को तत्पर था,

उस छ्लावे का अस्तित्व क्षणिक, नश्वर था ।

वो बना था उसके जैसे साहसिक मूर्खों के लिये,

स्वप्न ही उड़ जाते हैं, जिनकी बुद्धि को लिये ।

गिर पड़ा, फिर हंसने लगा, पागलों के जैसे

इंद्रधनुष के झूठ को कोस रहा हो जैसे ।

बहुत देर तक उसने इंद्रधनुष को घृणा से घूरा,

फिर धीरे-धीरे उसे चित्र समझ आया पूरा ।

कि है ये झूठ, किंतु सत्य इसको मैने माना,

अपने लालच की भूल को तब उसने जाना ।

है मेरी ही भूल, जानकर जब फिर पंख फैलाये,

मुसकुराकर चाहा कि इंद्रधनुष मुझे फिर न ललचाये ॥

----*---- - आद्या "कात्यायनी"

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