आ, अब घर लौट चलें

30 मार्च 2020   |  आशा “क्षमा”   (262 बार पढ़ा जा चुका है)

, अब घर लौट चलें ....


वर्षों हुए ज्यों घर छोड़े हुए,

अपनों से हृदय को जोड़े हुए ।

भागते रहे, दौड़्ते रहे,

दुनिया औ' धन-दौलत के पीछे ।

, अब अपनों की सुध लें,

, अब घर लौट चलें .....

बच्चे भी ना जानें, घर है क्या ?

सपनों में उड़्ते, पर धरती क्या ?

माता-पिता हैं, पर परिवार कहॉ ?

कोठी-मकान है, पर घर कहॉ ?

, अब बच्चों की सुध लें,

, अब घर लौट चलें ...

विदेश घूमे, वैदेशिक अपनाया,

अपना भूले, पश्चिमी अपनाया ।

महत्व न समझा, धरोहर का,

पूर्वजों का सब हमने भुलाया ।

, अपना सब कुछ सम्हालें,

, अब घर लौट चलें ......


-----*----- आशा क्षमा

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