मन भ्रम

28 मई 2020   |  मंजू गीत   (359 बार पढ़ा जा चुका है)

आंखों से पर्दा और तकदीर के लेख अपने समय पर ही खुलकर सामने आते हैं। बातों के फेर और मन भ्रम के फेर एक न एक दिन टूटते जरूर हैं लेकिन जब भी टूटते हैं, सोचने के लिए सवाल और सीख देकर जाते हैं। मन का भ्रम हो या हो मन प्रेम। मन के रिश्ते हैं। मन को ही समझ आते हैं। दिमाग तो है उलझनों का पिटारा, देखते हैं, कब जद्दोजहद के धागे सुलझ पाते हैं? करीब, बहुत करीब... इतने करीब होकर भी मुकद्दर दूर.. बहुत दूर छिटक ही जातें हैं। बड़ा ही सुकुन है, हां... बड़ा ही सुकुन है!‌ दर्द भी हंसना सीखा देता है। जब आपका दूर होना, किसी की खुशियों में इजाफा लेकर आया हो। हाथ और साथ लोग थाम लेते हैं, थमा देते हैं लेकिन सच यही है कि विपरीत हालात में आप खुद को अकेले और तन्हा ही पाते हैं। लोग जुबान और मकान, अब बदलें बदलें से ही पाते हैं। जो नहीं बदल पाते हैं वो दूसरों को निर्थक ज्ञान देते हुए पाते हैं। अक्सर बात करने को भी वह खुद को ही पाते हैं।

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