गीत

01 जून 2020   |  आलोक सिन्हा   (288 बार पढ़ा जा चुका है)

गीत

मानवता बेहोश पड़ी है , सच्चाई की बुरी घड़ी है ,

हिंसा नफरत ओढ़ रही हर बस्ती बस्ती इन्सान की ,

ये कैसी तस्वीर बन गयी मेरे हिंदुस्तान की |

पहले तो था एक दशानन ,

अब हर गली गली मिलते हैं |

कोई राम नहीं रक्षा को ,

सब मारीच बने फिरते हैं |

चीर हरण हो रहे रोज पर ,

कृष्ण एक भी नहीं जनमता |

हर कुर्सी पर कुम्भकरण या -

धृष्ट राष्ट्र का चहरा दिखता |

कुन्ती बस आंसू ढलती है, सीता दहेज में जलती है ,

सावित्री माडलिंग कर रही , चिंता न उसे परिधान की |

चन्द्रगुप्त ,चाणक्य , शिवाजी ,

मिशनरियों में इंगलिश पढ़ते |

मेनका परिचायक यान में ,

द्रोणाचार्य टयूशन करते |

तुलसी सूर कबीर खड़े सब ,

राशन की दुरूह कतार में |

भामाशाह ब्लेक करते हैं ,

हर उपभोग्य वस्तु बजार में |

जाति जाति में होड़ लगी है, जयचंद की तकदीर जगी है ,

वोटें हर भावना चर गईं , देश धर्म ईमान की |

लक्ष्मी चोरों के घर बंदी ,

न्याय यक्ष ने मोल ले लिया |

सब भोतिकता के अनुगामी ,

सदवृति को बनवास दे दिया |

व्यापारी स्वतंत्र वस्तु को ,

महगी दें अथवा कम तोलें |

धर्मों को है छूट देश में ,

चाहे कितना भी विष घोलें |

गंगा जल हो गया गदीला , मानव सर्पों से जहरीला ,

ऊपर से चाहे कैसा पर , भीतर सूरत शैतान की |

अगला लेख: नर्तकी ( कहानी )



सचमुच आज देश की यह तस्वीर देखकर बहुत दुःख होता है। हृदय की वेदना को उजागर करती यह रचना भारत को सचेत होने और सुधरने की प्रेरणा देती है।
सादर प्रणाम।

टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद |

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