गिला नहीं

05 जून 2020   |  मंजू गीत   (315 बार पढ़ा जा चुका है)

किल में टंगी गर्दन को भी आजाद होना था। रिस्क लेने, झेलने का दर्द भी बहुत हुआ, अब इसे भी खत्म करना जरूरी था। काम की दुनिया से बंधे थे, जो रिश्ते.. वो भी काम की ही दुनिया में सिमट जाएंगे। बिना हक और जरूरत के रिश्ते कब तक साथ चलेंगे? एक न एक दिन बीतते वक्त की धूल में गुम हो जाएंगे। सब भ्रम के पर्दे एक न एक दिन, एक एक करके उठ ही जाएंगे। हम जाएंगे, कोई और आएगा। दुनियां का दस्तूर है। किसी के जाने की ना खुशी है, और ना किसी के आने का गम। वक्त के आइने है। चेहरे और हालात बदल ही जाएंगे। दो कदमों की गाड़ी है, उजालों में संग खुद की परछाई है। इसके सिवा कुदरत की मेहरबानी है। भीड़ में तो खुद की परछाई भी औरों के संग, और औरों की परछाई आपके संग चलती नजर आ ही जाती है। अंधेरे में तो खुद की परछाई भी साथ छोड़ जाती है, औरों से तो गिला क्या करना। पर खुद का आधा खाली, भरा पूरा मन लिए आप कितने ही अजनबियों से बहुत कुछ बांटते, लेते चले आते हैं। सब अपनी रह गुजर के मारे वक्त के घेरे में कुछ वक्त के लिए साथ होकर फिर एक नए मेले‌ में खो जाते हैं।

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