मंगल बसेरा

13 जून 2020   |  मंजू गीत   (301 बार पढ़ा जा चुका है)

अपनी अपनी सब कहें, दूजे की सुनें समझें ना। दूसरे को भी अपने से बढ़कर समझें, तो दुःख काहे का होए। अपने को दूसरों की नजरों में, अच्छा बनाने के सो जतन, पर खुद से वास्ता ना होए, औरों के लिए जीने से अच्छा, अपनों संग खुद का भी बेहतर जीवन होए। ना जोगी बन, ना संन्यासी बन.. गृहस्थ जीवन से बढ़कर, ना कर्म तपस्या होए। अपना मान, जिन्हें चाहें, समझाएं.. वहीं नासमझी कर, मन का मंदिर ढाए, तो मन का सुख और दुःख किससे सांझा होए। होश संभलने से लेकर जों जिया हो तन्हा, अकेलेपन से अपनेपन का सुकुन पा, उसके जीवन में सुख संसार का बसेरा होए। जिया हो जों सदा दूसरों के लिए, मंगल जीवन जीने की दुआ का हकदार भी वह होए। अपनी अपनी सब कहें, दूसरे की सुनें समझें ना, शक और रंज लेकर औरों को भी घायल करें, खुद भी अंधा होए, सोचों समझों वक्त की नजाकत को, गलत समझा है जिसे, वह गलत ही होए। जरूरी नहीं कि आपका सोचा समझा ही पूरा होए, अपनों को चाह कहने से ही,प्रेम बसेरा होए.. दूसरे को भी अपने से बढ़कर समझें तो, दुःख काहे को होय..

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