अपना घर

20 जून 2020   |  मंजू गीत   (324 बार पढ़ा जा चुका है)

वो आई थी मेरे घर, अपना घर बनाने को.. तांक झांक कर देख गई, उठ बैठ कर देख गई, अपना घर बसाने को, वो आई थी मेरे घर, अपना घर बनाने को.. तिनका तिनका बीनने को, दिन पूरा जोड़ दिया, कुछ कम पड़ा तो कुछ और जोड़ लिया। वो आई थी मेरे घर, अपना घर बनाने को.. मेरे घर की आंखें, उसको देखें, उसकी आंखें उनको देखें, थोड़ी सी चाह अपनी लिए, चहक बिखेरती वो मेरे घर आई थी, अपनी बोली, प्रेम अहसास, चाह पाने वो आई थी... घर की वो छोटी, उसे लेकर चिल्लाई थी। फैला दिया है तिनका तिनका, मेरे घर में ये गंद फैलायेगी, उठाके छोटी, सब तिनके फेंक देती, जो वो बड़ी मेहनत से जोड़ जगोड़ के लाई थी। दो तीन दिन हुए थे अभी, छोटी कों वो एक आंख भी ना भाई थी। उसके घर के आगे,छोटी ने ईंट की आधी कुतर सरकाई थी। तिनका लेकर जब वो आई थी, शांत बैठ कुछ पल, वो भी सोच विचार लगाईं थी, बना कर अपना छोटा सा आशियाना, वो भी पछताई थी। मेरे घर में, छोड़ अपना आशियाना चली गई वो, शायद वो भी तिरस्कार ना सह पाई थी। वो नन्ही गोरैयां, सब छोड़ अपना, उड़ गई वो सोन चिरैया... जाने के बाद पलट दुबारा वो आई ना... वो आई थी मेरे घर, अपना घर बनाने को...

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