बहाने जिंदगी

27 जून 2020   |  मंजू गीत   (322 बार पढ़ा जा चुका है)

माना हम चिट्ठियों के दौर में नहीं मिलें, डाकिए की राह तकी नहीं हमने। हम मिले मुट्ठियों के दौर में। जिसमें रूमाल कम, फोन ज्यादा रहता था। माना हम किताब लेने देने के बहाने नहीं मिलें, जिसे पढ़ते, पलटते सीने पर रख, बहुत से ख्वाब लिए उसके साथ सो जाया करते। हम मिले मेसेज, मेसेंजर, वाट्स अप, एफ बी, इंस्टा के दौर में। जहां नजर एक टिक, दो टिक, नीले टिक पर अटक कर कभी खुशी, कभी झुंझलाहट पैदा करती। जब जरूरत या चाहत आवाज देती तो एक टिक जोड़ देता हमें। माना हम बाग बगीचों में नहीं मिलें, अमरूद, आम , फूल तोड़ने के बहाने। हम मिले बस, मेट्रो की भीड़ में, आगे टिकट बढ़ाने, सीट लेने देने के बहाने। माना हम नदियां किनारे नहीं मिलें, पानी भरने, नहाने के बहाने। हम मिले सड़क किनारे, बस स्टैंड पर, बस, रिक्शा, के इंतजार में। माना साथ रिश्ते, काम का मोहताज है। पर यादें तों मोहताज नहीं। माना हम एक दूजे के लिए कोई नहीं, फिर भी किस्मत है पूरब से पश्चिम मिलने की। माना जिंदगी है, मगर पराई है। पराई जिंदगी में छवि अपनी है।

अगला लेख: दूर



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
05 जुलाई 2020
दि
पढ़ें लिखे समझदार लोग, सांख्य, सवालों में गुम हो गए हैं। हर बात की नुक्ता चीनी में, रिश्ते दिमाग में कैद हो गये‌ है। पहले से ज्यादा भावों के अभाव हो गये है। लोगों के दिल तंग हो गये है, दिलों में अब खूबसूरत अहसास कम हो गये है। लोग बैठ अकेले, तन्हाई के मेले में खोकर , दुनिया से ही गुम हो गए हैं। प्या
05 जुलाई 2020
28 जून 2020
धी
कल्पना सपना से अबोध नहीं थी। कल्पना ने सपना को अपनी बातों की खनक से हमेशा धीर के सामने रखा। हालांकि वह दोनों के साथ नहीं होती थी लेकिन वह दोनों से कभी दूर भी नहीं थी। सपना धीरज का अर्धांग है और अर्धांग सांस, आस, विश्वास, से जुड़ा होता है। यह सच भी कभी झूठ नहीं हो सकता। लेकिन औरत भाषा और भाव में पु
28 जून 2020
20 जून 2020
वो आई थी मेरे घर, अपना घर बनाने को.. तांक झांक कर देख गई, उठ बैठ कर देख गई, अपना घर बसाने को, वो आई थी मेरे घर, अपना घर बनाने को.. तिनका तिनका बीनने को, दिन पूरा जोड़ दिया, कुछ कम पड़ा तो कुछ और जोड़ लिया। वो आई थी मेरे घर, अपना घर बनाने को.. मेरे घर की आंखें, उसको देखें, उसकी आंखें उनको देखें, थोड़
20 जून 2020
28 जून 2020
कल्पना को आज भी वह शब्द याद है। "साथी" सच इस शब्द के इर्द गिर्द उसने अपनी जिंदगी को बुनना शुरू कर दिया था। जिंदगी है क्या कभी जाना ही नहीं था। रात के अंधेरे में धीरज का मेसेज का स्करीन पर टू टू की आवाज के साथ आना। आज भी कल्पना की धडकनों में रमा है। शाम 8 बजे के बाद जब भी मेसेज की ट्यूनिंग आती। उसे व
28 जून 2020
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x