मुक्त काव्य

30 जून 2020   |  महातम मिश्रा   (317 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्त काव्य"


पेड़ आम का शाहीन बाग में खड़ा हूँ

फलूँगा इसी उम्मीद में तो बढ़ा हूँ

जहाँ बौर आना चाहिए

फल लटकना चाहिए

वहाँ गिर रही हैं पत्तियाँ

बढ़ रही है विपत्तियां

शायद पतझड़ आ गया

अचानक बसंत कुम्हिला गया

फिर से जलना होगा गर्मियों में

और भीगना होगा बरसातियों में

फलदार होकर भी जीवन से कुढ़ा हूँ

पेड़ आम का शाहीन बाग में खड़ा हूँ।।


डालियों पर दीमक खेल रहें हैं

लोग मुझपर जहर ढकेल रहें हैं

चिमनी का धुआँ मंडरा रहा है

मेरी महुआ का जी मिचला रहा है

हकीम नाड़ी दबा रहे हैं

अंकुरण को दवा पिला रहे हैं

नई प्रजाति का रोपड़ हुआ है

वन बाग का अजीब पोषण हुआ है

लगाने वाले अपनी गरिमा लगा गए

काटने वाले आरा चला गए

प्रति पल थपेड़ों से लड़ा हूँ

पेड़ आम का शाहीन बाग में खड़ा हूँ।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: दोहा



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
30 जून 2020
हा
"हाचड़" (फुरसतिया मनोरंजन)कौवा अपनी राग अलाप रहा था और कोयल अपनी। मजे की बात, दोनों के श्रोता आँख मूँदकर आत्मविभोर हो रहे थे।अंधी दौड़ थी फिर भी लोग जी जान लगाकर दौड़ रहे थे। न ठंड की चिंता थी न महंगाई के मार की, न राष्ट्र हित की और न राष्ट्र विकास की। अगर कुछ था तो बस नाम कमाने की ललक और बड़ी कुर्सी की
30 जून 2020
07 जुलाई 2020
मु
"मुक्तकसुनते रहिये गीत गायकी अपने अपने घर में।धोते रहिए हाथ हमेशा साबुन अपने घर में।आना जाना छोड़ कहीं भी धीरज के संग रहिए-पानी गरम गला तर रखिए हँसिए अपने घर में।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
07 जुलाई 2020
सम्बंधित
लोकप्रिय
कु
03 जुलाई 2020
दो
07 जुलाई 2020
मु
03 जुलाई 2020
मु
03 जुलाई 2020
कु
07 जुलाई 2020
कु
07 जुलाई 2020
गी
07 जुलाई 2020
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x