कुंडलिया

03 जुलाई 2020   |  महातम मिश्रा   (263 बार पढ़ा जा चुका है)

"कुंडलिया"


बंसी मेरे बीच में, क्यों आती है बोल

कान्हा की परछाइयाँ, घूम रही मैं गोल

घूम रही मैं गोल, राधिका बरसाने की

मत कर री बेहाल, उमर है हरषाने की

कह गौतम कविराय, मधुर बन पनघट जैसी

छोड़ अधर रसपान, कृष्ण की प्यारी बंसी।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: दोहा



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
07 जुलाई 2020
दो
तेरे बहिष्कार का आगाज़ भारत की जनता व सरकार दोनों ने कर दिया है रे पापी चीन, अब तेरा क्या होगा कालिया.......धाँय धाँय धाँय......."दोहा" उतर गया तू नजर से, औने बौने चीन।फेंक दिया भारत तुझे, जैसे खाली टीन।।नजर नहीं तेरी सही, घटिया तेरा माल।सुन ले ड्रेगन कान से, बिगड़ी तेरी चाल।।सुन पाक बिलबिला रहा, अब
07 जुलाई 2020
03 जुलाई 2020
मु
"मुक्तक" बहुत दिनों के बाद मिला है बच्चों ऐसा मौका।होली में हुडदंग नहीं है नहीं सचिन का चौका।मोबाइल में मस्त हैं सारे राग फाग फगुहारे-ढोलक और मंजीरा तरसे तरसे पायल झुमका।।पिचकारी में रंग नहीं है नहीं अबीर गुलाला।मलो न मुख पर रोग करोना दूर करो विष प्याला।चीन हीन का नया खिलौना है मानव का वैरी-बंदकरो ज
03 जुलाई 2020
30 जून 2020
हा
"हाचड़" (फुरसतिया मनोरंजन)कौवा अपनी राग अलाप रहा था और कोयल अपनी। मजे की बात, दोनों के श्रोता आँख मूँदकर आत्मविभोर हो रहे थे।अंधी दौड़ थी फिर भी लोग जी जान लगाकर दौड़ रहे थे। न ठंड की चिंता थी न महंगाई के मार की, न राष्ट्र हित की और न राष्ट्र विकास की। अगर कुछ था तो बस नाम कमाने की ललक और बड़ी कुर्सी की
30 जून 2020
30 जून 2020
मु
"मुक्त काव्य"पेड़ आम का शाहीन बाग में खड़ा हूँफलूँगा इसी उम्मीद में तो बढ़ा हूँजहाँ बौर आना चाहिएफल लटकना चाहिएवहाँ गिर रही हैं पत्तियाँबढ़ रही है विपत्तियांशायद पतझड़ आ गयाअचानक बसंत कुम्हिला गयाफिर से जलना होगा गर्मियों मेंऔर भीगना होगा बरसातियों मेंफलदार होकर भी जीवन से कुढ़ा हूँपेड़ आम का शाहीन बाग में
30 जून 2020
03 जुलाई 2020
मु
मुक्तक जी करता है जी भर नाचूँ, जीवन में झनकार लिए।सारे गुण की भरी गागरी, हर पन का फनकार लिए।सभी वाद्य बजने को आतुर, आए कोई वादक तो-शहनाई वीणा औ डमरू, सुरभित स्वर संसार लिए।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुर
03 जुलाई 2020
07 जुलाई 2020
मु
"मुक्तकसुनते रहिये गीत गायकी अपने अपने घर में।धोते रहिए हाथ हमेशा साबुन अपने घर में।आना जाना छोड़ कहीं भी धीरज के संग रहिए-पानी गरम गला तर रखिए हँसिए अपने घर में।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
07 जुलाई 2020
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x