मुक्तक

03 जुलाई 2020   |  महातम मिश्रा   (299 बार पढ़ा जा चुका है)


"मुक्तक"


बहुत दिनों के बाद मिला है बच्चों ऐसा मौका।

होली में हुडदंग नहीं है नहीं सचिन का चौका।

मोबाइल में मस्त हैं सारे राग फाग फगुहारे-

ढोलक और मंजीरा तरसे तरसे पायल झुमका।।


पिचकारी में रंग नहीं है नहीं अबीर गुलाला।

मलो न मुख पर रोग करोना दूर करो विष प्याला।

चीन हीन का नया खिलौना है मानव का वैरी-

बंदकरो जी हाथ मिलाना न खोलो मुख ताला।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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मुक्तक जी करता है जी भर नाचूँ, जीवन में झनकार लिए।सारे गुण की भरी गागरी, हर पन का फनकार लिए।सभी वाद्य बजने को आतुर, आए कोई वादक तो-शहनाई वीणा औ डमरू, सुरभित स्वर संसार लिए।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुर
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"कुंडलिया"बंसी मेरे बीच में, क्यों आती है बोलकान्हा की परछाइयाँ, घूम रही मैं गोलघूम रही मैं गोल, राधिका बरसाने कीमत कर री बेहाल, उमर है हरषाने कीकह गौतम कविराय, मधुर बन पनघट जैसीछोड़ अधर रसपान, कृष्ण की प्यारी बंसी।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
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"कुंडलिया"बचपन में पकड़े बहुत, सबने तोतारामकिये हवाले पिंजरे, बंद किए खग आमबंद किए खग आम, चपल मन खुशी मिली थी कैसी थी वह शाम, चाँदनी रात खिली थीकह गौतम कविराय, न कर नादानी पचपनहो जा घर में बंद, बहुरि कब आए बचपन।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
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मु
"मुक्तकसुनते रहिये गीत गायकी अपने अपने घर में।धोते रहिए हाथ हमेशा साबुन अपने घर में।आना जाना छोड़ कहीं भी धीरज के संग रहिए-पानी गरम गला तर रखिए हँसिए अपने घर में।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
07 जुलाई 2020
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