बदल‌ गया

08 जुलाई 2020   |  मंजू गीत   (287 बार पढ़ा जा चुका है)

मशीनों के बलबूते बहती धाराओं पर, मनुष्य के लालच ने अवरोध लगाये। लहलहाती फसलों के लिए रसायनों के प्रयोग अपनाएं, आश्रित जीवों के क्रम को भेद, मनुष्य के लालच ने धरा को बंजर कर डाला है। ज़मीं के गड्ढे पाटें जातें नहीं, अंतरिक्ष में गेंद उछाला जाता है। धरा का स्वर्ग नरक कर डाला, इंसान अपने मतलब के लिए हर जगह अपनी मनमानी करता है। कागज के फूल खिला कर, नक़ली खुशबु से खुश होता है। ताल तलैया, मोर चिरैया, नीर खैवइया, मिट्टी कुइयां, खपरैल गैइया, माली बगिया, कलम खड़िया, दवात पटिया, मैया भैइया, की मौजूदगी में नेकी भली थी। जब से खो गई है ये रोनके तब से, बरगद से शीतल हवा एसी की ऐसी तैसी में खो गई। मुल्तानी मिट्टी को साबुन शम्पु ने को दिया। मिट्टी के चूल्हे की गर्म, बांसी करारी रोटियां अब गैस वाले चुल्हो ने का लीं। ज़मी के सीने में पिलर डाल जबसे मकान लगें बनने तबसे घरों की नीव‌ जल्दी जल्दी खाली हो गई। मटके का पानी पी, भूलें भटके लोग घड़ी,पहर भर ठहर बातें चार कर जाते थे। आज खरीद बोतल पानी की, मोबाइल में आंख गड़ाए एक ही राह, गली में उल्टे सीधे घूमा करते हैं। बोल बतला के अक्षर ढूंढने से नहीं मिलते हैं। पानी, चुल्हा, चौपाल, बूढ़े पेड़, गांव के बच्चे बुजुर्ग सबके लिए एक होते थे। अब हर घर में बंटवारे, पहले इनके होते हैं। जब ढूंढने चले इंसानियत तो इंसान की दुनिया से खाली हाथ लौट आए, तभी इंसाफ करने को कुदरत खुद से उतर आई।

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