तुम

15 जुलाई 2020   |  मंजू गीत   (266 बार पढ़ा जा चुका है)

मैंने तुम्हें सपने में देखा, अब तुम्हें देखने का, यही तो एक जरिया बचा है। इन दिनों... अब तुम तो हमें देखने या मिलने से रहें। भूलने की आदत जो है तुम्हें। खैर ! अब तुम्हें लेकर बुरा भी क्या मानें? क्योंकि उसके लिए भी, हक‌ जो ढूंढने पड़ेंगे हमें। हां, आजकल तुम सपने में भी, मोबाइल में नजरें गड़ाए हुए दिखाई देते हों। तुम जो देखते हों, उन आंखों को मालूम है बेहतर। उसे अब क्या लिखूं? आज कल तुम सपने में दिखते हों।

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