इंसान की फितरत

19 जुलाई 2020   |  Arun choudhary(sir)   (295 बार पढ़ा जा चुका है)

बदल गयी है ,इंसान की अब अपनी फितरत;

बदल रहा है,इंसान अब पैमाने ए कुदरत।


जीने की परिभाषा,विकास की अभिलाषा;

सब कुछ बदल रहा,पूरी करने अपनी लालसा।


प्रकृति को छेड़ , छीन पशु पक्षियों का आसरा;

स्वार्थ के अतिरेक,जंगल पे मंडरा इंसानी खतरा।


अपनी मर्यादा लांघ,कई देशों का किया निर्माण;

अपने लिए कई द्वीप सजाएं,जानवरों का हुआ प्रयाण।


खुद ही फंस गया चक्रव्यूह में,जो उसने खुद है रचा;

कोरोना वायरस के कारण,घरों में कैद हो खुद है बचा।


आज इंसान ने ,मानवीयता पर खड़ा किया है प्रश्नचिन्ह ;


संसार को जीतने के लिए,खड़ा किया है वायरस जिन्न।


अपने ही पैरों पे मार कुल्हाड़ी,शुरू किया खुद का विनाश;


बेमानी बेमतलब रह जाएगा ,सभ्यताओं का ये विकास।


प्रेम,सहयोग,मित्रता,हो गयी है इंसानी स्वार्थ प्रेरित भावना;


झूठ,बेईमानी,और शत्रुता, घर कर गयी इंसान में ये दुर्भावना।


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