वचनामृत

21 जुलाई 2020   |  विश्वमोहन   (336 बार पढ़ा जा चुका है)

https://vishwamohanuwaach.blogspot.com/2020/06/blog-post_26.html वचनामृत

क्यों न उलझूँ
बेवजह भला!
तुम्हारी डाँट से ,
तृप्ति जो मिलती है मुझे।
पता है, क्यों?
माँ दिखती है,
तुममें।
फटकारती पिताजी को।
और बुदबुदाने लगता है
मेरा बचपन,
धीरे से मेरे कानों में।
"ठीक ही तो कह रही है!
आखिर कितना कुछ
सह रही है।
पल पल ढह रही है
रह-रह, बह रही है।"
सुस्ताता बचपन
उसके आँचल में
सहसा सजीव हो उठता है।
और बुझाने को प्यास
उन यादों की।
मैं चखने लगता हूँ
तुम्हारे वचनामृत को !

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आलोक सिन्हा
24 जुलाई 2020

बहुत अच्छी रचना है | सुगठित , मर्मस्पर्शी |

रेणु
21 जुलाई 2020

स्नेहिल नोंकझोंक भरा, हृदयस्पर्शी शब्द चित्र दाम्पत्य जीवन का!! जब एक पति , पत्नी में प्रेमिका से लेकर माँ का साक्षात दर्शन करता है, वही है पत्नी के नारीत्व का संपूर्ण सम्मान और प्रेम का सर्वोच्च उत्कर्ष!! आपका जीवनकलश इस सुंदर वचनामृत् से सदैव भरा रहे आदरणीय विश्वमोहन जी।हार्दिक शुभकामनायें ।
सादर🙏🙏

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