यात्री मार्ग और लक्ष्य

24 जुलाई 2020   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (353 बार पढ़ा जा चुका है)

यात्री मार्ग और लक्ष्य

यात्री मार्ग और लक्ष्य

यदि मैं देखती रही बाहर
तलाशती रही यहाँ वहाँ येन केन प्रकारेण
मन की शान्ति और आनन्द को
तो होना पड़ेगा निराश
क्योंकि कोई बाहरी वस्तु, सम्बन्ध, या कुछ भी और
नहीं दे सकता आनन्द के वो क्षण / शान्ति के वो पल
जो मिलेंगे मुझे केवल अपने ही भीतर
इसीलिए तो करती हूँ प्रयास झाँकने का अपने भीतर...

डूब जाने का कहीं गहन अंत:स्तल में
नहीं है मुझे चिन्ता इस बात की
कि यहीं डूब कर रह गई तो क्या होगा
नहीं घबराती सोचकर
कि नहीं आ सकी बाहर तो क्या होगा
क्योंकि जानती हूँ
बाहर आकर समाप्त हो जाएँगे एकान्त के वो पल
जिनमें अनुभव होता है मुझे परम शान्ति और आनन्द का
शेष रह जाएगा कुछ यदि
तो वो होगा मात्र अकेलापन
भरी भीड़ में भी
छिन जाएगी सारी शान्ति
हो जाएगा तिरोहित सारा आनन्द
बाहर के कर्णभेदी कोलाहल से
बहुत बड़ा अन्तर है अकेलेपन और एकान्त में
अकेलेपन में है छटपटाहट, घबराहट
एकान्त में है आनन्द, शान्ति और स्वयं का साथ
जानती हूँ, देखती रही यदि बाहर ही
तो नहीं कर पाऊँगी अनुभव उस आनन्द और शान्ति का
जो प्राप्त होता है स्वयं अपना ही साथ पाकर
गहरे पैठकर कहीं अपने अंत:स्तल में
वास्तव में ये जीवन कुछ भी नहीं
यात्रा है केवल अकेलेपन से एकान्त की ओर
कोलाहल से शान्ति की ओर

विषाद से आनन्द की ओर

और एकान्त, शान्ति तथा आनन्द की इस यात्रा में

मैं स्वयं ही हूँ यात्री

स्वयं ही हूँ मार्ग

और स्वयं ही हूँ लक्ष्य भी...

पूरी रचना सुनने के लिए वीडियो देखें... कात्यायनी...

https://youtu.be/MOzDxU1pyOE

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