रुठे है अपने

24 जुलाई 2020   |  मंजू गीत   (280 बार पढ़ा जा चुका है)

मुझे कहता ए जमाना बिगड़ा, मैं किसी की सुनतीं ही नहीं.. मुझसे रूठे है मेरे अपने, घर बाहर यार परिवार, अब कोई बात करता नहीं। मुझे कहता है जमाना बिगड़ा, मैं किसी की सुनतीं ही नहीं... मैं भी हूं आखिर इंसान, कब तक मैं झुकती रहूं.. दिल पर लगें हैं कितने घाव, ये किसी ने कभी पूछिया ही नहीं, सब अपने गए हैं रूठ, अब बात कोई करता नहीं। मुझे कहता है जमाना बिगड़ा, मैं किसी की सुनतीं ही नहीं... सब रखते हैं उम्मीद, बिन उम्मीद के कोई हमें मिलया ही नहीं, सब दुनिया लगती है फरेब, अब बात करने का मन किसी से करता नहीं। मुझे कहता है जमाना बिगड़ा, मैं किसी की सुनतीं ही नहीं... लोग पल पल करते हैं मुझे जज, अब मन किसी से जुड़ता नहीं.. कागज, पत्थर संग बीत रही जिंदगी, अब जिंदगी, जिंदगी लगती नहीं, अपनी सांसें भी करने लगीं है तंग, अब किसी का संग हमें जचदा ही नहीं। मुझे कहता है जमाना बिगड़ा, मैं किसी की सुनतीं ही नहीं... मेरा वक़्त है, अभी बिगड़ा.. मैं लोगों से लड़ती नहीं, खुद से ही हैं, अब मेरा झगड़ा.. कहां कसर कोई रखदी मैंने? नहीं था किसी को अपना बनाना, बदलते वक्त में छूट जाता है, पीछे जमाना... मुझे कहता है जमाना बिगड़ा, मैं किसी की सुनतीं ही नहीं....

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