यादें

24 जुलाई 2020   |  Arun choudhary(sir)   (340 बार पढ़ा जा चुका है)

कुछ मीठी,कुछ खट्टी,कुछ कड़वी,कुछ रंगीन,

कुछ बचपन की,कुछ जवानी की,कुछ संगीन।

ये ही तो हैं वो यादें,जो भूले ना भुलायी जा सकी;

कुछ यादें पूरी याद रही,याद रह गयी अधूरी बाकी।

कुछ यादें तड़पाती है,कुछ प्रफुल्लित कर जाती है;

यादें तो यादें हैं ,जो कभी हंसा तो कभी रुला जाती है।

कभी मुस्कान ,कभी शिकन,कभी शांति ,चेहरे पे लाती है;

ये यादें ही तो है,जो बैठे बैठे चेहरे के रंग बदल जाती हैं।

कोई अपनों के बिना, इन यादों के सहारे जी जाता है;

तो कोई यादों के बिना,जीते हुए भी नहीं जी पाता है।

यादों के इस विशाल समुंदर में, गोता कोई लगा जाता है;

वह मोती और सिप जैसे,रिश्तों की बुनियाद रख जाता है।

अकेलेपन का सहारा होती है,उसका विश्वास होती है यादें;

जीने का मकसद लिए,किसी को पुनर्जीवित कर देती है ये यादें।


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