आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू

27 जुलाई 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (344 बार पढ़ा जा चुका है)

आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू

साप्ताहिक प्रतियोगिता में "प्रथम" सर्वोतकृष्ठ चयनित रचना

समुह का नाम:- साहित्यिक मित्र मंडल जबलपुर ( एम. पी.)
पटल संख्या: १-२-३-४-५-६-७ एवम् ८
संपर्क:- 9708055684 / 7209833141
शीर्षक: आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
💧💧💧💧💧💧💧💧💧💧
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
भक्तों का सर्वश्रेष्ठ धन है गिरते आंसू
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
मानव मन होता है अति चंचल,
प्रचण्ड उच्चाटन्, अति विह्वल
दर्शन पाने की आज

उठी उत्कट् है इच्छा
व्यर्थ हुआ समस्त ज्ञान,

अधुरी गुरुकुल की शिक्षा
आलोढ़ित मन का चितवन,
मन तो आखिर है एक मन-
डोलेगा हीं, वो रे! डोलेगा
मन जब अति आह्लादित-
नयन होते तब अश्रुप्लावित
एक को ठहरा कर हीं-
दूजा कुछ तो बोलेगा
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
भक्तों का सर्वश्रेष्ठ धन है गिरते आंसू
💧💧💧💧💧💧💧💧💧💧
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
प्रसव-पीड़ा की विदारक चित्कार

असख्य वे झर-झर्र झरते आंसू

जन्म के समय नवजात का
क्रंदन और निसरे आंसू

सुख मिलता तब भी

बह जाते ये आंसू
दुख मिलता तब भी

टपक पड़ते हैं ये आंसू
प्रतारणा-द्वेष-कलह के आंसू
पठन-पाठन-लेखन के आंसू
ठहराये ठहरते नहीं ये आंसू
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
💧💧💧💧💧💧💧💧💧
भाँति-भाँति के बह ठहरते ये आंसू
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
धुयें के निकलते माँ के वो आंसूं
प्रेम देख प्रेयसी के गिरते आंसू
प्रेम छीन ले कोई तब भी आंसू
विश्वासधात् लख निकले आंसू
शरण मिली तब भी आते आंसू
भक्तिमय भजन कीर्तन में आँसू
आसक्ति के असफलता पर आँसू
विरक्त हुए परन्तु छुपके-

निकल पड़ते आंसू
जीत तो है जीत,

हारने पर भी निकले आंसू
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आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
बहे कितने, सूख रहे ये बहते आंसू
रुग्णताजनित पीणादायक ये आंसू
स्वास्थ्यलाभ हुआ तब भी ये आंसू
💧💧💧💧💧💧💧💧💧💧
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
दिख रहा पर चू न पाता यह आंसू
अपना कुछ खो जाये तब भी आंसू
खोया पा जाने पर भी निसरे आंसू
💧💧💧💧💧💧💧💧💧
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
प्रिय मरण- तो बह सूखते है ये आंसू
पुनर्जीवित होने पर जीवन देख आंसू
मन ठहरे न ठहरे,

ठहर जाते ये निर्मोही आंसू
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
💧💧💧💧💧💧💧💧💧
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
बहकर गालों पर टघरते ये

ठहरे हुए आंसू
आँखों में संकेत पा

बना वाह्यश्राव है आंसू
मन में रख लेने से तो
मन धुट सा जाता है
चित्त ठहरता नहीं
वस्तु की ओर जाता है
ध्यान कठिन हो जाता है
कीर्तन में रम जब जाता है
ध्यान सहज लग जाता है
सतसंग में भाव आ रुलाता है
प्रभु चर्चा से मानव मुक्त हो जाता है
महासागर से मोती चुन ले आता है
'मानव जीवन' धन्य हो जाता है
विदेही आत्मा के प्रति

श्रद्धांजलि के आंसू
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
💧💧💧💧💧💧💧💧💧💧
डॉ. कवि कुमार निर्मल
बेतिया (पश्चिम चंपारण) बिहार 845438

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