सच्चा मित्र

02 अगस्त 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (310 बार पढ़ा जा चुका है)

सच्चा मित्र

असली मित्र

जिंदगी से मुलाक़ात


एक बार गोष्टियों में यह बात हुई।
असली मित्र कौन? बहस बेबात हुई।।
धमासान चला वर्षों वाक् युद्ध।
अंत में निष्कर्ष यही निकला शुद्ध।।
मित्रता की सोंचे वो है पगला।
हम हैं तो कोई मित्र बने हमारा।।
हम न रहे लो श्मशानधाट हमारा।।
साँसों के तार का ताना-बाना,
जीवन हीं परम मित्र हमारा।।।
मुलाकात जिंदगी से पहली बार हुई,
न हुआ अहसास, न वैसा दिमाग था।
दुसरी मुलाकात हुई राह चलते,
दर्दों का न कोई पारावार था।।
मुलाकात होती रही बार-बार,
मिलना हआ बेहद आसान,
कुछ बहाना- करना कॉल था।
अपने - पराये का मन में--
न कभी आया ख्याल था।।
कभी भूख खातीर था हंगामा,
पर प्यारा सा माँ का हाथ था।
कभी खेल-कूद की मस्ती,
नुक्कड़ पर अटका रहता प्राण था।।
दिमागी खुराक मिलती रही,
दुनिया के तिलिस्म का--
हुआ कुछ-कुछ अन्दाज था।
चाँद-तारों से भरा सर पर--
खुला हुआ आसमान था।।
समझ न आया सबक सारा,
मालिक का दिया नेह भरा काम था।
कुछएक लकिरें उकेर डाली,
शरहदों के पार गया नाम था।।
मुलाकात का शिलशिला,
जद्दोज़हद सह खुशगवार गुजर गया।
कुछ पाके बेसक- हुई बहोत खुशी--
कुछ खोके ना हुआ नासाज़ था।।
रक़ीब सारे, अज़ीज हबीब बन गए,
नफ़रत का नामो-निशान न था।
महफ़ील जब भी सजी-सवँरी,
फरिस्तों में लिखा गया नाम था।।
सच कहूँ दोस्तों? साहील ओ'
हर मुक़ाम चलता साथ-साथ था।
कवि अकेला न रहा कभी,
हमदर्द काफ़िले का साथ था।।


डॉ. कवि कुमार निर्मल

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