कहानी एक फूल की

08 अगस्त 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (401 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी एक फूल की

🥀🥀कहानी एक फूल की🥀🥀


🌳🌳🌷🌺🌺🌺🌷🌳🌳
कहानी फूल की तुझे आज सुनाता हूँ
मत जाना कहीं-आद्योपांत सुनाता हूँ
ऊँचे दरख़्त झूम- झूम कर ताज़िन्दगी,
छाँव-बतास ओ' गुल- फल लुटाते हैं!
वख्त की मार कहूँ या तूफानों से धिर,
गीर-पड़ उखड़ निर्जीव हो जाते हैं!!
डालें टुंग-टुंग कर मानव दो शाम,
असंख्य चुल्हें जल-

जठराग्नि बुझाते हैं!
राख का ढ़ेर बन मिट्टी में

मिल-मिट जाते हैं!!
दरख़्त की जड़ें फिर से

पनप उग पसर जाती हैं!!
🌳🌲🌴 🍃🥀🥀🥀🍃🌴🌲🌳
माँ-बाप भी आज-कल

बेजान दरख़्त बन,
अश्रु दो-चार भी नहीं बहा रे पाते हैं!
रवानगी की कज़ा देख झेल कर भी,
मुस्कराते हुए कहीं गुम हो जाते हैं!!
परागण से कलि खिलने तक की
देवों के सर पर चड़ इतराने की
सुरबाला को सजा महकाने की
पैरों तले कुचल मसले जाने की
कहानी का सार तुझे सुनाता हूँ
पंखुड़िया सूख कर झड़ जाने की
इत्र बन खुशबुएं फैला लुटाने की
धूल संग उड़ दूर कहीं जाने की
फूल एक था अद्भुत ब्रह्म कमल
काल चक्र की बात मैं बताता हूँ
कहानी फूल की तुझे आज सुनाता हूँ
मत जाना कहीं-आद्योपांत सुनाता हूँ
🌷🌺🌹🌷🏵️🌷🌹🌺🌷


💞💞डॉ. कवि कुमार निर्मल💞💞

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