सागर की लहरें....

11 अगस्त 2020   |  अशोक सिंह   (1884 बार पढ़ा जा चुका है)

सागर की लहरें...


सागर की लहरें किनारे से बार-बार टकराती

चीखती उफान मारती रह-रहकर इतराती

मन की बेचैनी विह्वलता साफ झलकती

सदियों से जीवन की व्यथा रही छिपाती

पर किनारे पहुँचते ही शांत सी हो जाती

वह अनकही बात बिना कहे लौट जाती

अपने स्पर्श से मन आल्हादित कर जाती

संग खेलने के लिए उत्साहित हो उकसाती

जैसे ही हाथ बढ़ाता छूकर चली जाती

वहाँ बैठे रहने का एक वजह छोड़ जाती।


इक शाम मुझे देखकर थोड़ी सी मुस्कुरायी

किनारे बैठा देखकर पास तक चली आयी

अकेले मेरे साथ बतियाने में जरा शरमाई

बलखाती लहराती चाल से थोड़ा भरमाई

चिंतित तन्मय भाव को भाँप कर फरमाई

यों अकेले में उदास क्यों बैठे हो मेरे भाई

न कोई साथी दोस्त अरे कहाँ गई भौजाई

चेहरे की उदासी बयां कर दी हुई लड़ाई

दिनरात की किचकिच ने ही बात बढ़ाई

वहाँ बैठे रहने का उसे वजह समझ में आई।


आजकल लोंगों का नजरिया बदलने लगा

माँ-बाप के प्रति बेटे का रवैया बदलने लगा

शादी के बाद फौरन चूल्हा अलग होने लगा

जोरू के चक्कर में परिवार बिखरने लगा

भाई-भाई के बीच का मनमुटाव बढ़ने लगा

राम-लक्ष्मण का वह मिसाल अब मिटने लगा

राम के लिए भरत का त्याग भी बिसरने लगा

श्रवण कुमार भी तो अब पैतरा बदलने लगा

इंसान भी राम-रहीम के चक्कर में फंसने लगा

इंसान का फितरत देखो कितना बदलने लगा।


लहरों ने मुस्कुराते हुए अपने स्वभाव को बतलाया

इंसान का दिया हुआ सारा माल वैसे ही लौटाया

किनारे पर जमा हुए कूड़े कचरे को दिखलाया

विसर्जन के नाम पर इंसान ने गंदगी था फैलाया

फूल माला नारियल के संग दीपक था जलाया

बप्पा की मूर्ति गहरे पानी में ले जाकर डुबाया

उलाहना भरे शब्दों ने दिल को झकझोर दिया

सागर में विसर्जन न करने का संकल्प किया

लहरों ने हाथ मिलाकर स्वच्छता का वचन लिया

सागर किनारे बैठे रहने का मुझे भी वजह मिला।


सागर की लहरें जोर-जोर से करने लगी थी गर्जना

किनारों से टकरा -टकराकर उसका सिर पटकना

अतिक्रमण से तंग आकर यों नराजगी दिखलाना

मुखरित प्रबल स्वर में उसका अपनी व्यथा सुनाना

समुद्री किनारों पर आ-आकर इंसानों का बस जाना

बार-बार पीछे हटने को सिमटने को मजबूर करना

आखिर कब तक और कितना है अत्याचार सहना

मैंने सदियों से साथ दिया है ले लो रामसेतु का बनना

सीने पर बड़ी-बड़ी जहाजों युद्धपोतों का भार उठाना

विश्व के कोने-कोने तक प्रमुदित सुरक्षित पहुँचाना

फिर क्यों इंसान चाहे है…. मेरे अस्तित्व को मिटाना

इंसानी स्वार्थवृत्ति से जायज़ है लहरों का आहत होना।


➖ प्रा. अशोक सिंह…..✒️

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लाजवाब

अशोक सिंह
02 सितम्बर 2020

साधुवाद🙏

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