आत्मकथा एक फूल की

24 अगस्त 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (310 बार पढ़ा जा चुका है)

आत्मकथा एक फूल की

आत्म कथा एक फूल की


मैं फूल एक

डाल से लटका

खिल उठा

अपने आपको- कभी

बागान को देख रहा
खुशबुएँ लुटा सबको

रिझा रिझा पास बुलाया
छू कर अँगुलियों से ललच

तोड़ अपने घर ले आया
महक कई बार मुझे

एक गमले में लगा सजाया
देखता रहा परिवार संसार,

बहुत हीं भाया
पर शुद्व हवा बिन,

धीरे धीरे कुंभलाया
हवा का एक तेज झोंका आया
पर सूखा- झेल नहीं पाया
अपनी पँखुड़ियों को
गिर धूल में,
मन में
दुख
बहुत ही
आ रुलाया
चिंता बस थी
परिचित बगान की
जिससे तोड़
निर्मोही
मुझको
लाया
फिर वो
आ तोड़ मुझे
उसी बगान में
छींट पानी की
बुँदो से नहलाया
समय बीता कुछ सरपट-
अपनी तरुण काया मैं पाया
कलियों का खिलना भी देखा-
यौवन का ओज- सुख बहुत पाया
फिर वही सुहानी सुबह-
खिल खुद को अपनों में पाया
यह झड़ जाना ओर फिर
उग जाना, समझ में मेरे आया
🌹🌸🌹🌸🌹🌸🌹
डॉ. कवि कुमार निर्मल

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